Happy Lohri Wishes image लोहड़ी

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Happy Lohri Wishes image ( लोहड़ी क्या है। ) लोहड़ी पौष के अंतिम दिन को सूर्यास्त के बाद (माघ संक्रांति से पहली रात) को यह त्यौहार मनाया जाता है। प्राय: लोहड़ी 13/14 जनवरी को पड़ता है। यह मुख्यत: पंजाब का पर्व माना जाता है। लोहड़ी के परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक गाथाएँ भी इससे जुड़ी हैं। लोहड़ी में जो अग्नि दहन होती है। वो दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन से जुड़ी है। लोहड़ी के अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से लोहड़ी पर्व पर वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फल आदि भेजा जाता है।

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लोहड़ी की तैयारी

20 -25 दिन पहले से ही होने लगती है। लड़के लड़कियाँ लोहड़ी के लोक गीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करने लगते हैं। इकठ्ठे लकड़ी और उपलों से चौराहों के खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। मुहल्ले या गाँव भर के लोग अग्नि के चारो ओर बैठते हैं। और लोहरी गीत गेट हैं।  अपने अपने काम काज से निवृत हो कर सभी परिवारवालों के साथ अग्नि की परिक्रमा करते हैं। और रेवड़ी आग में चढ़ाई जाती है और बची रेवड़ी प्रसाद के रूप में सभी लोगों को बाँटी जाती हैं। जब सभी घर लौटते हैं तो उस समय लोहड़ी में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में अपने घर पर लाने की प्रथा वर्षों से चली आ रही है। ( Happy Lohri Wishes image लोहड़ी  )

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लोहड़ी व्याहना

शहरों में कुछ शरारती लड़के दूसरे मुहल्लों में जाकर लोहड़ी से जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने मुहल्ले की लोहड़ी में डाल देते हैं। कई जगहों पर जैसे में लड़ाई भी हो जाती है। पर इस लड़ाई को मस्ती मजाक ही मन जाता है। शरारती लड़के के जगहों पर लकड़ी के आभाव में दुकान दरों की बेंच भी जला देते हैं। लोहड़ी का पर्व पंजाबियों और हरियाणवी लोगो का प्रमुख त्यौहार माना जाता रहा है। यह लोहड़ी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा, जम्मू काश्मीर, दिल्ली और हिमांचल में धूम धाम से मनाया जाता हैं। यह पर्व मकर संक्राति से एक दिन पहले 13/14 जनवरी को हर वर्ष मनाया जाता हैं।  ( Happy Lohri Wishes image लोहड़ी  )

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लोहड़ी का त्यौहार और दुल्ला भट्टी की कहानी क्या है

लोहड़ी दुल्ला भट्टी की कहानी के नाम से भी जाना जाता हैं। लोहड़ी की सभी गीतों में दुल्ला भट्टी का जिक्र है। तथा यह भी कह सकते हैं कि लोहड़ी के गीतों का केंद्र दुल्ला भट्टी हैं। मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में दुल्ला भट्टी रहता था। उनको पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस वक्त संदल बार के जगह लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच दिया जाता था। दूल्हा भट्टी ने उन लड़कियों को इस पीड़ा से आज़ाद करवाया और उनकी शादी हिन्दू लड़कों से करवाई दुल्ला भट्टी को विद्रोही माना जाता था जो वंशवली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे। जो की संदल बार में थे। अब बटवारे के बाद संदल बार पकिस्तान में चला गया। वह सभी पंजाबियों का नायक थे।  Happy Lohri )

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